Connect with us

Intellectual

आत्मचिंतन

Published

on

बड़ी दिलचस्प सी लगती है,
बदलते हुए रफ़्तार की ख़ामोशी,
शोर से तितर बितर है अंग अंग जीवन का,
अर्सों बाद लेते है छुट्टी कभी खुदसे गुफ्तगू करने की।।

सुबह होती है शाम ढलती है,
धीरे धीरे ज़िन्दगी भाग रही है,
अपनों से हाथ पकड़े बातें किए हुए,
बन चुका है यह लम्हा भी,
ईदी के चांद जैसा ही।।

सोचते है जब सोचने बैठें तो,
क्या यूहीं यह ज़िन्दगी कट जाएगी,
मौत के वक्त भी शायद यह देह,
दुनियादारी में ही उलझ के रह जाएगी।।

मुत्मयिं कोई जहां नहीं,
अंत नहीं कभी तृष्णा की,
मेहरूम क्यों करता है खुदको खुदसे,
इस चकां चौंध में उम्र कट जाएगी।।

मत बना सारथी उसे,
जो स्थायी नहीं,
घनघोर अंधकार है वहां,
जो दिखता नहीं,
चमक जाए जो तारे की भांति,
कमान दे उसे अपने रथ की,
रोशनी तो चांद की बेशक उत्तम हो,
पर देता है वो सबको एक झांसा ही।।

बहुत कीमती है सांसों की माला,
आत्मचिंतन कर,
वक्त तो चलता रहेगा,
इसे ना पकड़,
उभर आयेगा तू भी इस जहां में,
बस खुदपे थोड़ा सा विश्वास तो कर,
इंसान है तू बहुत खूबसूरत,
खूबसूती को नजरंदाज मत कर।।

Jahnabee is an Independent working lady, Pet lovers, travel freak, music mind, culinary explorer, an extrovert and at the very core…a poet.

Continue Reading
4 Comments

4 Comments

  1. Meenakshi Rani

    January 7, 2021 at 8:19 PM

    Awesome… No words to say…

  2. Avinash+Kumar

    January 14, 2021 at 7:49 PM

    Just Wow…

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Like Us!