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अनुभूति

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मैं उदास तो नहीं था
इक आंसू से हल्ख रम गया..

ये दिन तो एक ही था,
कुछ सालों जैसा लम्बा
शिकवों से भरा भरा,
जैसे वक़्त ही हो थम गया…

इस गर्म हवा की सर्दी में
पिघले लोहे का इक कतरा,
जैसे फिर से हो जम गया..

इक आह का शब्द गूंजा,
हो जैसे गिरी गगन में
और गर्जना से उसकी,
एक लम्हा हो सहम गया…

इक मौन के भंग होने से,
इक हर्फ़ के जुदा होने तक
ये अनुभूति हो गयी है
जैसे दशकों लम्बा ग़म गया..

 

Rajesh Kamboj

[email protected]

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1 Comment

1 Comment

  1. Anonymous

    April 7, 2020 at 6:02 PM

    बाबा जी आप ग्रेट हो,,तोहफा कबूल करो

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