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Charu Parashar

पिंजरा

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बंदिशों में ना बांध मुझे ए मुसाफिर,
मैं वो चिड़िया हूं पिंजरा तोड़ जाती है
उस टूटे पिंजरे पे शोक मना रहा है अब मुसाफिर,
कोई चिड़िया उस पिंजरे में कैद ना हो पाती है

जिन ज़ख्मों के साथ फिर वो चिड़िया उड़ जाती है
उन्हें हर दिन वो भरती है ,
अपने सपने पूरे करती है
उन सपनों से जब तुम जलते हो,
देख के उड़ान उसकी तुम पिघलते हो
क्या हुआ तुम्हे एहसास, कि पिंजरा छोटा था
या पता चला तुम्हे तुम्हारी सोच छोटी थी

सोचो कभी आसमान के परे भी,
एक जहान था जहां मैं उड़ जाती थी
क्या मिलता है किसी को बांध के ऐसे
कैसे भूल गए तुम भी, कैद थे मेरे साथ उसी घर में
तुम्हे लगा तुमने मुझे बांध लिया,
उस आलम में तुम तो खुद को ही बांध बैठे

अब जिओ तुम भी अपनी ज़िन्दगी
जाओ मैंने आज़ाद किया
ये गुरूर नहीं है मेरा बढ़पन है
के हां सच में मैंने तुम्हे माफ किया

 

Charu Parashar

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3 Comments

3 Comments

  1. Mohit

    April 8, 2020 at 5:01 PM

    Nice well done keep it up

    • Charu

      April 8, 2020 at 10:01 PM

      Thank u

  2. Ritesh

    April 9, 2020 at 11:47 AM

    Superb mam..

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