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काश..

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काश कोई समझ ले इस बात को
इस दिन की ख़ामोशी और तन्हा रात को
इक अक्स को पाने जैसे जन्मों कोई भटका
ढूँढा तो दोज़ख़ पाया इस कायनात को |

सुकूँज़दा फ़िज़ाओं का जो दौर था
ख़ुद-एत्मादी के तूफाँ का शोर था
न मुनाफ़े का जश्न न खोने पर कोई शिकवा
फ़र्ज़ी अक्लमंदी से जुदा कुछ और था |

आँधियों के मौन और शोर-ए-आब को
बादलों के गम भरे सैलाब को
महसूस कर सकने की ताक़त आ गई
टूटे हुए सपने और बिखरे ख़ाब को |

यादों और जज़बातों से लब इक दास्ताँ
इक इश्क में बेहोश और इक बंद ज़ुबाँ
दो ज़हीनों की ज़हनियत से बुना
वक्त की तल्ख़ी से झुलसा वो जहाँ |

दायरों को तोड़ने की बुज़दिली
मज़हबी हवाओं में है सदियों से घुली
तोड़कर भी मंज़िल रहेगी ख़ाक ही
जिसमें हिम्मत वालों की लाशें हैं मिली |

 

Rajesh Kamboj

[email protected]

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1 Comment

1 Comment

  1. Anonymous

    April 24, 2020 at 9:39 PM

    Bhut Khoobsurat

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