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Charu Parashar

आज़ादी

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क्या कभी सोचा है तुमने
कितनी बार लोगों से खुद को खुद ही बांधा तुमने
क्या कभी टूटे पिंजरे से आजाद होना बर्बाद लगा तुम्हें
शायद दुनिया ने नहीं, खुद को दुनिया में कैद कर लिया तुमने

आजाद होकर भी वह चिड़िया भटक जाती है
वो आज़ादी उसे आज़ादी नहीं बर्बादी लगती है
क्यों खुद को दूसरों से ऐसे बांधना कि खुला आसमान ही एक पिंजरा बन जाए

जब अंदर आजाद होने की तमन्ना नहीं
बल्कि पिंजरे के टूटने का खौफ हो
समझ लेना तुम्हें क़ैद करने वाला कोई मुसाफिर नहीं
उस पिंजरे में कैद होने वाले तुम खुद हो

जब आजादी में वह चिड़िया घुटने लगी
खुला आसमान भी उसके लिए वीरान हो गया
तब पिंजरा ही नहीं उसका साथ भी टूट गया
कुछ समय के लिए वो खो गई

क्यों खुद को हम ऐसी जोड़ लेते हैं
क्यों समझ नहीं पाते
राही का काम तो चलते जाना है हर दिन नया सूरज जिंदगी में आना है
अब छोड़ दो ये लालच भरा पिंजरा
और गले लगाओ उस आसमान को
वह वीरान नहीं बस इंतजार में है
कि उसे भी कोई खोज सके
उससे आगे भी एक जहान है जहां तुम्हें उड़ जाना है।

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5 Comments

5 Comments

  1. Azam

    April 11, 2020 at 7:12 PM

    Ati utaam
    Shabdo ko Bahut hi anokhe andaaz me piroya hai Apne, Bahut gahrai hai apki poem me.
    Mujhe lagta hai Apko aur likhna chaiye

    • Divyanshi

      April 11, 2020 at 9:57 PM

      Amazing

  2. Sahil

    April 11, 2020 at 7:53 PM

    Very nice

  3. Divyanshi

    April 11, 2020 at 9:57 PM

    AMAZING

    • Anonymous

      April 13, 2020 at 4:55 PM

      Bhot pyari likhi hai charu ..!wish to see more of your collection ❤️

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