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अंधाधुंध

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हादसे कुछ ज़िंदगी के हैरान करते हैं,
जिनके हम किरदार होते हैं,
बहुत कुछ चल रहा है शायद,
फिर भी हम अंजान बने रहते हैं।

कभी ख़ामोशी को जो समझते थे,
आज शब्दों से भी ना समझ है,
अल्फ़ाज़ बहुत हैं कहने को,
पर ज़रूरत उनकी शायद अब खत्म है।

मूक हूं मैं जीवन को झांकते हुए,
बड़ी संगीन है खामोशी मन की,
शोर रहता है अंदर हमारे,
नकाब ओढ़े घूम रहें सब छलावे की।

हैरान हूं मैं इस नाटक से,
कितने गहरे सन्नाटे हैं इस हलचल में भी,
बड़ी-बड़ी बातें हैं हम सबकी,
पर खोखली हो चुकी है आत्मा भी हमारी।

एक अंधकार में चल रहें शायद,
अपने वजूद से परे,
हार चुके अपने मूल जज़्बातों को,
हंसी भी हमारी एक झूठ सी लगे।

ज़माने के कायदों ने,
काफ़ी बदला है मुझे,
प्यार की बातें करते हैं,
पर दिलों में द्वेष है भरे।

तक रहा जो खुले आसमान से,
हर तरफ़ एक साया है,
इंसान ही इंसान को,
आखिर कहां समझ पाया है।

कई रिश्तों से घिरे हैं,
हर वक्त जो देखते हमें,
क्यों फिर भी हम अपने,
जज़्बातों को छिपा लेते
हादसे कुछ ज़िंदगी के हैरान करते हैं,
जिनके हम किरदार होते हैं,
बहुत कुछ चल रहा है शायद,।
फिर भी हम अंजान बने रहते हैं।

Jahnabee is an Independent working lady, Pet lovers, travel freak, music mind, culinary explorer, an extrovert and at the very core…a poet.

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2 Comments

2 Comments

  1. Avinash kumar

    June 20, 2020 at 7:14 AM

    Excellent Jahnabee

  2. Charu

    June 20, 2020 at 5:19 PM

    Wow

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