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अन्तिम अध्याय

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एक कागज़ जिंदगी का वो भी है,
जो अभी पलटा नहीं,
देखने के लिए जिसे हम,
ज़िन्दा शायद रहे नहीं,
दूर कहीं बसता है वो,
जिसका ठिकाना हमें मालूम नहीं|

एहसास से दूर,
उसकी एक चादर है,
लिपटे है हम सब जिसमें,
दृष्टिकोण से परे है,
एक नयी कहानी की ये शुरुआत है,
आज नहीं कल की इसमें बात है,
गुज़रते लम्हों का अपना राग है,
जीयो इसे जान से,
कल का किसको पता है|

खामोशी नहीं उसके जाने की,
सफ़र का ये अल्पविराम है,
रचता जाए जिसमें हर कोई,
रंगीन दुनिया का सबसे हसीन परिणाम है,
इंसान का यहीं साहिल है,
जिसकी कश्ती हमारा जीवन है,
अनन्त नहीं यहाँ पे कुछ भी,
आना जाना ही इसका क्रम है|

क्या खूब है ये ज़िंदगी,
मंजिल पे पहुँचने का भी यकीन नहीं,
सोता हूँ जब मैं आँखें बंद करके,
रोते है सब मेरे खुशी से भी,
लिखावट इसकी पहचानी नहीं,
ज़िन्दा था तो कुबूल नहीं,
अब सुकून मिला है थोड़ा,
लेकिन मुझे उसकी भी इजाज़त नहीं|

समझ से परे इसके,
उसूल जीवन के है कुछ ऐसे,
साँसें लेना भी इसकी निशानी,
चले जाना भी इसी की कहानी,
जो समझ ले इस खूबसूरती को,
जीना मरना उसके लिए एक समान ही|

भयभीत है निर्गमन से उसके,
साथ उसका ना तुझको भाए,
हर पल को बना एक ज़िन्दगी,
जाने से उसके आँखें ना नम हो जाए,
सितारों को कमी कहाँ बादल की,
वो भी एक ध्रुव तारा बन जाए,
ऐसी मोहब्बत रख मन में अपने,
जाने का गम ना तुझे सताए|

Jahnabee is an Independent working lady, Pet lovers, travel freak, music mind, culinary explorer, an extrovert and at the very core…a poet.

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6 Comments

6 Comments

  1. Sanghamitra

    January 16, 2020 at 9:26 PM

    Fantastic as always

  2. Dr Sandeep

    January 16, 2020 at 10:04 PM

    May be I am not that intelligent, I can’t understand what you want to say?

    • Jahnabee

      January 17, 2020 at 9:10 AM

      Hello Sir,

      This poem is more in the philosphical perspective wherein i have mentioned the last journey of man. What are the different scenarios which we can’t even see in an open way..

  3. Nikhil

    January 17, 2020 at 9:00 AM

    Bro
    Osam
    Keep inspiring

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