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Intellectual

दरिद्रता

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बड़ी सीमित रह गई है जिसकी परिभाषा,

नाम है उसका दरिद्रता,

सभी के आंगन में मिलती है,

पर गरीब को ही संबोधित यह करता।।

 

कोई खुशी की अभिलाषा का मुसाफ़िर है,

कोई जीवन के रंगों से बेजान,

कोई बन जाता है काफ़िर यहां पर,

तो कोई हो जाता है हीनता का शिकार,

फिर क्यों यह दरिद्रता घिरे हैं गरीबों को,

आवश्यकता पड़ ही जाती है हर किसी की किसी को।।

 

रूठे मनों में अक्सर दिखती है झलक खो जाने की,

सिले लबों पे शिकवों को देखा है,

हंसी के पीछे छिपे आंसू पीके,

लोगों को ठीक है कहते हुए भी सुना है,

फिर क्यों यह दरिद्रता घिरे हैं गरीबों को,

हर कोई पूरा करना चाहता है अपनी किसी कमी को।।

 

कभी उम्र की दरिद्रता है, कभी उमंग की,

कभी रस की दरिद्रता है, कभी हास्य की,

कभी चरित्र की दरिद्रता है, कभी प्रेम की,

कभी खुशी की दरिद्रता है, कभी संतुष्टि की,

कभी संतान की दरिद्रता है, तो कभी खुद को पाने की,

फिर क्यों यह दरिद्रता घिरे है गरीबों को,

हर कोई निर्धन है जीने के लिए इस भवसागर को।।

 

तृप्ति की बातें करते हैं भोर विभोर,

फिर भी क्षुद्र है प्रवृत्ति से,

अमीर गरीब के कटघरें में,

अक्सर बिक जाते हैं मतलब ज़िंदगी के

फिर क्यों यह दरिद्रता घिरे हैं गरीबों को,

हंसते हैं हम उन पर, दिलों से अमीर है जो।।

Jahnabee is an Independent working lady, Pet lovers, travel freak, music mind, culinary explorer, an extrovert and at the very core…a poet.

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