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दरिद्रता

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आज जब निकलने लगी उस मोड़ से,
तो सवाल करती उन आंखों ने मुझे रोक लिया,
कहती दीदी खाने को कुछ दे दो,
भगवान आपका भला करेगा,
सुनकर मेरी आंखें भर आई,
लगा कृतार्थ रहूं जो पाया सब मैंने,
क्यों बेबस हूं कुछ ना कर पाने पे,
बहुत लिखा आज तक जो दिल ने,
सोचा थोड़ी स्याही लिख दूं इन बेरंग सपनों पे।।

बड़ी कठोर है दरिद्रता की महामारी,
किसी को नींद देती है तो किसी को सपने,
पैसों में इतनी बरकत कहां जो रिश्तें दें,
एक गरीब की कुटिया ही तो है जहां मिलते अपने।।

उन आंखों में देखी कई अधूरी अभिलाषाएं मैंने,
कभी भर पेट खाके सोने की,
तो कभी बेसुध होके अपने बचपन को जीने की,
कभी बिना मांगे सब कुछ पाने की,
तो कभी एक आम सी ज़िन्दगी जीने की,
बहुत अफ़सोस होता देख कर हमारा भविष्य,
आवाज़ देना चाहती हूं उन बेजुबानों को देख के यह दृश्य।।

जिन हाथों में किताबों की रेखाएं नहीं,
वह आगे क्या बढ़ेंगी,
जिस चेहरे पर मासूमियत की परछाई नहीं,
वह खुद्दार क्या बनेंगी,
समानता पूर्वक जीने का अधिकार है सबका,
जिस बचपन को मिला नहीं मासूमियत का ज़माना,
उसे जवानी क्या मिलेगी।।

फ़िर भी हंस के आगे बढ़ जाते हैं,
अधूरी उम्मीदों में खुश हो जाते हैं,
आशियाना नहीं है उनके पास,
खुले आसमान के नीचे भी संतुष्ट हो जाते हैं।।

हैरान करती मुझे तस्वीरें समाज की,
कहीं देखती हूं सुनहरा जहां पूरा होता हुआ,
तो कहीं सिसकती आंहों में डूबती हुई अनगिनत शामें भी,
कहीं मां सुनाती है लोरियां बच्चों को,
तो कहीं होती है चर्चा आने वाले कल की,
संबोधित करता यह समा कई चेहरे,
जाने पहचाने, अपने बेगानें,
कुछ वो जो हम जैसे दिखतें हैं,
कुछ वो जिन से हम रास्तों में मिलते हैं।।

Jahnabee is an Independent working lady, Pet lovers, travel freak, music mind, culinary explorer, an extrovert and at the very core…a poet.

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2 Comments

2 Comments

  1. R.t.yadav

    February 5, 2021 at 11:24 PM

    Very beautiful poem
    Bahut shandar

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