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एक उम्र छोटी सी…

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Ek umra Chhoti si

ज़ुबानी उस खामोश आवाज़ की,
जो कभी उठ ना सकी,
निगाहें उन आखों की,
जो कभी देख ना सकी,
लड़की हूँ मैं,
लड़की ही रहने दो,
क्यों सबकी खामोंशी बनूँ,
कभी बेटी तो कभी बहन की इज़्जत बनके रहूँ|

अलग रिवाज़ है दुनिया का,
घर की तहज़ीब बेटी लाये,
धीरे बोलना उनका चालन,
बेटे चाहे हुकुम चलाये|

दो घरो में बटी हुई,
सर्वस्व उसका कुछ भी नहीं,
जब तक है किसी और की अमानत रहेगी,
दूसरा घर भी उसका अपना नहीं|

पैदा होती तो लक्ष्मी,
फिर क्यों बादमे एक बोझ बनती,
सब सुखो का मूल रूप उसमें है,
फिर क्यों वो सबके लिए एक समझौता कहलाती|

अस्तित्व अपना छोड़के दूसरा वसन पहनती,
क्यों वो हमेशा सबकी खुशियों की ज़िम्मेदारी लेती,
वो भी अंश है,
जिसे हक है निर्भय जीने का,
सिर्फ एक लड़की है,
क्या उसका कोई धरोहर नहीं|

शादी ही उसकी पहचान,
खुदमें वो कभी काफ़ी नहीं,
तमाशा है जो सब देखते,
कुछ कहे तो हमेशा चुप्पी मिलती|

वो सजावट का सामान नहीं,
ना ही दीवार की खूबसूरती,
एक चंचलता है उसमें भी,
हमेशा लड़की नहीं इनसान समझके देखो कभी,
कुछ रंग उसके भी अलग है,
वो भी अपने लिए जीना चाहती,
बेटी बहन ही नहीं,
पहचान वो भी अपनी बना सकती||

Jahnabee is an Independent working lady, Pet lovers, travel freak, music mind, culinary explorer, an extrovert and at the very core…a poet.

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