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Hope

काश

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काश का जामा पहनें हुए,
अक़्सर हम इतने बहाने ढूंढ लेते हैं,
खुद को महरुम और लाचार करने के,
अनगिनत सवाल खुद पे उठा लेते हैं।

यह काश की परिभाषा बड़ी अलग है,
छिपे हुए इसमें कई अधूरे ख्वाब है,
हर कोई पाने की चाहत रखता इसको,
पर पूरे करने के जज़्बात ही शायद नाकाम है।

अच्छी किस्मत यूं ही कहां आती है,
दर्द की ठोकरें तो कामयाबी की सीढ़ी होती है,
पहन ले जो उम्मीदों से परे अपने हौंसलों को,
“काश ऐसा हो जाता तो” उसकी कमी सबसे कम होती है।

काश ने ओढ़ा जब महत्वकांक्षाओं को,
एक बात तो साबित हो जाती है,
नकारात्मक सोच है यह अपने आप में,
हमें एक झूठी तसल्ली जो दे जाती है।

वास्तविकता और काश के बीच,
एक यकीन का ही तो फ़र्क है,
फ़र्क वो जो कभी समाज तय करता है,
तो कभी हमारे मां-बाप,
पर क्या यह स्वाभाविक है,
हमारे आचरण की ज़िम्मेदारी क्यों लेता कोई और है।

अफ़सोस मत करना कल,
जो आज खुद को आज़मा न सका,
ज़िंदगी तो यूं ही होती है,
इसी सोच में नसीब को कोसता रहा,
मौका नहीं देती हर बार यह कायनात,
कर ले खुद के लिए वह सब कुछ,
जिसे सोच कर कल तू बोले कि यह तो अधूरा ना रहा।

संजोए ख्वाब पूर्ण कर ले,
यह तो तेरी धरोहर है,
अपने लिए थोड़ा और जीना,
इसमें सही और क्या ग़लत है,
मुमकिन सब है इस अस्थायी जीवन में,
फिर क्या कभी यह काश का प्रयोग करना उच्चतम है।

सोचती है जाह्नवी गर उससे पूछा जाए तो,
ज़िंदगी का हर अवसर उसने जीया हो,
काश का उपयोग अक़्सर वह करते हैं,
आशंका जिसके मन में हो,
बैठूं जो कभी ज़िंदगी के बीच,
मेरे जीवन में काश की कोई जगह ना हो।

Jahnabee is an Independent working lady, Pet lovers, travel freak, music mind, culinary explorer, an extrovert and at the very core…a poet.

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4 Comments

4 Comments

  1. Avinash+Kumar

    January 29, 2021 at 8:17 PM

    Great… Reality of life and possibly everyone going through it

  2. Anonymous

    January 29, 2021 at 9:02 PM

    Very nice poem

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