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Social Issues

कटाक्ष

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धराशायी हुआ है आज अन्नदाता,
ख़त्म हो रही भारत की लोकतंत्रता,
सब बैठे मूक देख रहे हैं तमाशा,
राय दे दो जो अपनी तो कहते हैं तुम्हें कुछ नहीं आता।

लहू जो बह रहा,
क्या वह इतना नापाक है,
इतने सालों से पेट भरा जिसने,
आज उसी की पहचान को मिटाना है,
फिर नारा भी हमारा जय-जवान जय-किसान हैं,
और सत्ता से अपनी इन दोनों को लड़वाना है।

क्या खूब रंग दिखाया है भारतवासी होने का,
महीनों तक सो रहे थे,
आज याद आई उन्हें अपनी एकता की,
जब साथ दिया किसी बाहर वाले ने है।

हर कोई कूटनीति का हक़दार है,
अपनी गृहस्थी को बचाना ही सब का मूल आधार है,
बेचैन हो जाते हैं फिर अचानक सब,
क्योंकि बैठे सारे सरकार के कर्ज़दार हैं।

बचपन में सिखाया जाता,
सत्य का आचरण करो,
देश की प्रगति का कारण बनेगा,
पर इस राजतंत्र के झूठ से कोई कैसे बचेगा,
कभी उन्हें आतंकवादी कहकर बुलाया,
तो कभी खालिस्तानी,
मुद्दे की बात करो तो दिखा जाते हैं अपनी नादानी,
बिक चुकी जहां समाचार पत्रों की रूह भी,
लाभ के लिए जिन्होंने बाटे भारत को दो टुकड़ों में भी।

यह जो काटें रास्तों पर बिछाए हैं,
यह जो दीवारें इरादों पर लगाए हैं,
कम है जनाब हौसलों को तोड़ने के लिए,
देश की मिट्टी है यह,
सोना भी देती है तो कभी क्रांति भी।

Jahnabee is an Independent working lady, Pet lovers, travel freak, music mind, culinary explorer, an extrovert and at the very core…a poet.

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2 Comments

2 Comments

  1. Monika

    February 5, 2021 at 4:15 PM

    So true

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