Connect with us

Hope

खिलें होंठ

Published

on

क्या मुस्कुराहट की कोई परछाई होती है,
यह तो एक पल में अपने रंग बांट जाती है,
खिल जाते हैं अक़्सर दिल के कोने में बैठे रंजो गम,
जब भी अपना मरहम उस पर लगा जाती है।

हंसी का दर्पण तो कुछ ऐसा होता है,
हर कोई अपने आप को जिस में देखना चाहता है,
फिर क्यों हम खुद को बांध लेते हैं,
मुस्कुराने की वज़ह ढूंढते रह जाते हैं।

कितनी बातें अक़्सर हम भूल जाते हैं,
शिकवें ही हैं जिनको याद रख पाते हैं,
कहती है जाह्नवी कि पिरोले अपने हर ग़म,
क्योंकि खिलें होठों की मुस्कान ही एक अपनी होती है।

खिलखिलाहट होठों को एक जान देती है,
बेजान हो जाती है जब धड़कने दिल की,
भूल जाता है जब इंसान बेवजह हंसना,
बार-बार ज़िंदगी कभी मौका नहीं देती।

अपने पराए, ऊंच-नीच, काले गोरे का बैर न इसमें,
हर लिबास में यह सुनहरी लगती है,
बड़े दिलचस्प लगते हैं मुझे वह लोग,
जो खुशी में भी नाप तोल के हंसते हैं।

कई दफ़ा देखा है ज़िंदगी को कठोर बनते हुए,
पर गलती क्या सारी उसकी है,
सब कुछ पाकर भी लोगों में,
कहीं ना कहीं हर कमी की आपत्ति है।

तो बात बस इतनी सी है,
कि हर खुशी को हम चूम नहीं सकते,
बैठें हैं सिक्कों के बीच अगर,
हर वक्त का हिसाब हम रख नहीं सकते,
शायद इसीलिए मनुष्य परेशान हैं,
जो हंस दे जीवन के अनुभवों पर,
उसी इंसान के खिले होठों को कहते मुस्कान है।

Jahnabee is an Independent working lady, Pet lovers, travel freak, music mind, culinary explorer, an extrovert and at the very core…a poet.

Continue Reading
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Like Us!