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Social Issues

किसान

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निंदा क्या करें समाज की,
लोकतंत्र भारत अब रहा कहां,
देश कि मिट्टी में जो पले बड़े,
आज मिट्टी से ही उन्हें कर दिया जुदा।।

हैरान करती है मुझे ये ज़ंजीरें,
शायद उनकी भी मजबूरी है,
वरना पेट भरने वालों को,
वो भी कहां बांध सकती हैं।।

झुलस रहा है वहीं इंसान,
दिन रात एक कर जिसने खुदको खोया,
चैन से जब सो रहे थे बाकी सब,
बीज उसने उम्मीदों का बोया।।

ग्रीष्म आती सर्द जाती,
अपने मनोबल से जिसने भारत को कृषिप्रधन देश बनाया,
अत्याचार हो रहा उस पे आज,
कभी तीव्र पानी तो कभी अनैतिक शब्दों से उसे डराया।।

ये लाचारी नहीं है उनकी,
एक मौका है हमको भी,
समझ जाएं जो इस शासन पद्धति को,
पैसा ही होता जिनका मूल धर्म भाई।।

जिन्होंने रंग दिए बंजर ज़मीन को,
कभी हरा तो कभी सुनहरा,
भूल गई है सरकार उसे,
नाम दिए त्यौहारों को जिसने अपने कर्म से हमेशा।।

बैसाखी हो या लोहरी,
मकर संक्रांत हो या पोंगल,
ओणम हो या बिहू,
उत्सव नहीं ये केवल जो दर्शाती,
मेहनत है किसान के जो अलग रूपों से जाने जाते,
क्यों भूल गए है हम फिर,
रुलाके कृषक को भारतवर्ष भी कहां सो पाएगा,
आज देश से वो लड़ रहा है, कल आम इंसान भी पछताएगा।।

Jahnabee is an Independent working lady, Pet lovers, travel freak, music mind, culinary explorer, an extrovert and at the very core…a poet.

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2 Comments

2 Comments

  1. Pooja sood

    January 13, 2021 at 3:02 PM

    Vry bful poem jahanbee

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