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Intellectual

मेरी कलम

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दरकिनार कर दिया जब,
ज़िंदगी की ख्वाहिशों को,
तो बड़ी अपनी सी महसूस हुई मुझे मेरी कलम,
जितनी चलती रही ये, मिटते गए उतने मेरे भरम।।

उल्लेख क्या करूं मैं इसके बारे में,
हर एहसास को महसूस करती ये,
तजुर्बा इसका अलग है,
अपनी कहानी में किरदार भी इसके,
जैसा चाहें बना सकती है,
दरकिनार कर दिया जब,
लोगों की उम्मीदों को,
तो बड़ी अपनी सी महसूस हुई मुझे मेरी कलम,
जितनी चलती रही ये, मिटते गए उतने मेरे भरम।।

कभी बैरागी मन शिकायत करता,
तो कभी उज्जवल भविष्य ये लिखता,
कभी रिश्तों में छिपे सन्नाटे पढ़ता,
तो कभी मोहब्बत की दूरी का हर घूंट पीता,
दरकिनार कर दिया जब,
गुज़रते वक्त की टिक टिक को,
तो बड़ी अपनी सी महसूस हुई मुझे मेरी कलम,
जितनी चलती रही ये, मिटते गए उतने मेरे भरम।।

विशेषताएं इसकी बहुत हैं,
कभी सम्मान भी देती, तो क्रांति भी कभी लाती,
बिना कहें कुछ अपशब्द लेकिन,
सही गलत का आईना भी दिखाती,
दरकिनार कर दिया जब,
अंधकार में छिपी नामुमकिन सोच को,
तो बड़ी अपनी सी महसूस हुई मुझे मेरी कलम,
जितनी चलती रही ये, मिटते गए उतने मेरे भरम।।

पूछती है मुझसे कभी ये,
ज़ुबान बड़ी है या कलम,
जवाब में क्या कहूं उसे,
जुबां जो ना कर पाए वही तो करती है कलम,
दरकिनार कर दिया जब,
हर सही गलत को,
तो बड़ी अपनी सी महसूस हुई मुझे मेरी कलम,
जितनी चलती रही ये, मिटते गए उतने मेरे भरम।।

बोल कर मोहब्बत कहां जता पाता है इंसान,
जो लिखावट में तब्दील होतें हैं,
चिल्लाकर परिवर्तन कहां आ सकता है,
जो स्याही से लिखें जातें हैं,
दरकिनार कर दिया जब,
समाज में विकसित झूठे अभिमान को,
तो बड़ी अपनी सी महसूस हुई मुझे मेरी कलम,
जितनी चलती रही ये मिटते गए उतने मेरे भरम।।

महसूस होता है कि बड़ी अकेली हूं,
रिश्तें बहुत है फिर भी अधूरी हूं,
कभी जो आंसू भर आए कोरे कागज़ पर,
तो लिखकर अपने ग़म बहा देती हूं,
दरकिनार कर दिया जब,
कंधों का सहारा लेके अफ़सोस करना,
तो बड़ी अपनी सी महसूस हुई मुझे मेरी कलम,
जितनी चलती रही ये, मिटते गए उतने मेरे भरम।।

Jahnabee is an Independent working lady, Pet lovers, travel freak, music mind, culinary explorer, an extrovert and at the very core…a poet.

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