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Intellectual

प्रतिअंकित

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Pratiankit

स्पर्श किया प्रतिबिम्ब को,
जब वक्त ने सिखाया मुझको,
ज़ज्बातों का खेल है यह एक,
जिसके लिए हम जीये खोके खुदको।

धार सी दिल को पिघला रही,
कई प्रश्न है छिपे मेरे अवलोकन में,
देख के जिनको हँस रहे सपनें,
तमन्नाओं ने भी अब छोडे़ साथ मेरे।

बदलती राहों के मंजि़लें भी अलग है,
कहाँ जाना है छोर से बेखबर है,
बहुत राही है अलग रंगों के,
कोई छाप छोड़ जाता है अपने रंग का,
और कोई रंग बना जाता है अलग होने का।

द्वेष नहीं मेरे मन में,
यह वो अरमानों का ज्वाला है,
जिसकी ताप से मैं बदल रही हूँ,
दर्द तो है मुझे पर सोना ही बन रही हूँ।

कुभ की भाँति बदल रही,
कभी आँच से बारिक,
तो कभी सहनशक्ति बढी़,
बहुत आसान है बनाना मुझको,
छुओं तो आकार बदलती,
और देखों तो मिट्टी की तरह झड़ जाती,
फिर भी खुदको ज़मीन से जोड़ लेती,
आकारहीन हूँ, पर फिर भी सबके काम आती।

Jahnabee is an Independent working lady, Pet lovers, travel freak, music mind, culinary explorer, an extrovert and at the very core…a poet.

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5 Comments

5 Comments

  1. Abhishek Kalia

    November 28, 2019 at 10:18 PM

    Great Wordings with deep meanings.
    Loved it.

  2. Prince

    November 28, 2019 at 10:32 PM

    द्वेष नहीं मेरे मन में,
    यह वो अरमानों का ज्वाला है,
    जिसकी ताप से मैं बदल रही हूँ,
    दर्द तो है मुझे पर सोना ही बन रही हूँ।

    Brilliant work jahnabee… Beautiful lines

  3. Nikhil

    November 29, 2019 at 6:39 AM

    Perfect one bro
    U r osam
    Keep writing
    Keep inspiring

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