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रूबरू

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सिरहाने तकिये के बैठ के,
कई ख़्याल आते हैं,
ज़िंदगी के तजुर्बे को ज़रा हम,
और गौर से सोचते हैं,
कभी गलतियां नज़र आती हैं,
तो लगता है कि काश ऐसा नहीं होता,
फ़िर दूसरे पल महसूस करते,
कि जैसे आज हम हैं, शायद फ़िर वो भी कभी नहीं होता।।

आत्मचिंतन अच्छा है,
ज़रा गुफ्तगू करतें हैं तो खुद को और जानते हैं,
अच्छाइयां हो या बुराइयां,
अपने आप को पहचानते हैं,
गिला नहीं कोई वक्त से,
ज़िंदगी बहुत कुछ सिखा रही,
कभी बहुत नाज़ुक,
तो कभी आत्मनिर्भर बना रही।।

हिसाब में जो कटे तो मायने क्या बचें,
दायरें में जो रहें तो रिश्ते क्या बनें,
प्रतिबिंब है जीवन आईने जैसा,
हमेशा सही रहे तो सबक क्या सीखें।।

एक सागर की भांति खामोश है,
कभी शोर है नदियों का,
तो कभी आना जाना है तूफानों का,
इस हलचल में शायद डूब रहा मेरा फलसफा,
जितना भी तय करते यह सफ़र,
साहिल से फ़िर भी हमेशा खुद को दूर ही पाया।।

बड़ी अनजान है राहें मेरी,
कहां ठहरेंगी वह वज़ह ढूंढ रही,
खुद से जुदा हूं मैं, सोचती हूं आज कल,
सवाल पूछती हूं और जवाब भी खुद ही दे रही।।

रस्ते धुंधले हैं,
आंखें नम करना चाहती हूं मैं,
खुद को सही नहीं,
ग़लती के साथ अपनाना चाहती हूं मैं,
ज़िंदगी भाग रही,
ज़रा पैदल चलना चाहती हूं मैं,
बहुत थक गयी हूं,
थोड़ा आराम करना चाहती हूं मैं,
जो मर गया है मुझ में कहीं,
उस वजूद को ज़िंदा करना चाहती हूं मैं,
मोहब्बत जो की रिश्तों से,
अब थोड़ी मोहब्बत खुद से भी करना चाहती हूं मैं।।

Jahnabee is an Independent working lady, Pet lovers, travel freak, music mind, culinary explorer, an extrovert and at the very core…a poet.

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2 Comments

2 Comments

  1. Nikku+arora

    January 17, 2021 at 9:21 PM

    Beautifully expressed
    We should love ourselves

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