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वो पांच दिन

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पहलू कई है जीवन में इसके,
कई राज़ अनकहे रहे हैं,
कैसे बयां करूं व्यक्त जो करना है,
नाम सुनकर ही सब खामोश हो जाते हैं।।

वो पांच दिन कुछ ऐसे हैं,
जिसका ज़िक्र शायद चुभता है,
शर्म क्यों आती है सबको,
यह औरत का ही हिस्सा है।।

दर्द के भी अनेक रूप है,
जो उसके जीवन चक्र को दर्शातें हैं,
कई रंग है इस के दामन पर,
किंतु यह लाल रंग सबसे गूढ़ा है।।

स्त्रीत्व की पहचान है ये,
फिर क्यों लोग घृणा करते हैं,
महीने के वह पांच दिन,
पूरी ज़िंदगी साथ हमारे चलते हैं।।

जीवन का ये बदलाव उसे स्वीकार नहीं,
फिर भी वह ढ़लती है,
पीड़ा उन दिनों की देह को,
बिना झलकाए काम करती है।।

कई उतार-चढ़ाव आते हैं मनोदशा में,
जो उसे घेर लेते,
एकांकी मिल जाए थोड़ी सी,
जो उसे राहत दे जाते।।

कभी हो जाए बिना चिंतन के,
हम भी अपने त्योहार मनाए,
तिथि को देखे बिना भी हम,
हर खुशी को जी पाए।।

कश्मकश है देखो कैसी,
इसके बिना न जीवन कोई,
प्रतिबिंब है यह औरत का,
काश समझ सकता ये हर कोई।।

ज़्यादा कम की तुलना नहीं ये,
ना शिकवा और प्रशंसा के भाव है
पूछना चाहती है जहान्वी प्रकृति से
कि दर्द का संचालन हमसे क्यों है।।

Jahnabee is an Independent working lady, Pet lovers, travel freak, music mind, culinary explorer, an extrovert and at the very core…a poet.

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6 Comments

6 Comments

  1. Avinash kumar

    April 9, 2020 at 4:24 PM

    Great Jahnabee

  2. Sangita

    April 9, 2020 at 6:55 PM

    Very nice poem

  3. Charu

    April 9, 2020 at 9:15 PM

    Wow Di, this is surely a topic we should never shy to share, it needs to be put out at world now.

  4. Kanav Khanna

    April 9, 2020 at 11:31 PM

    Great mam

  5. Anonymous

    January 31, 2021 at 7:16 PM

    Right and nice this is the Essional part of everywomen

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