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Intellectual

ज़ुबां

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बहुत कुछ सिखा रही जिंदगी,
वक्त नहीं दे रही,
सपने आंखों को दिखाकर,
क्या छीन रही सांसे मेरी।।

ऊंचे ऊंचे सपने हैं,
पर दिल का आंगन सूना है,
दौड़ भाग कर मुझसे यूं,
कठोर मुझे क्यों बना रहीं।।

ढलता है दिन जब,
कई सवाल यह मुझसे पूछती,
इन हसीन लम्हों को,
तू क्यों बेरुखा बना रही।।

हंस लूं दो पल मैं,
क्या इतनी सी इजाज़त नहीं,
दर्द कम हो जाए मेरा,
दिल को मैं बस इतना समझा रही।।

मोहब्बत के सिर्फ दो पहलू हैं,
कभी जीता हुआ लगता है,
दोष मेरे दिल का नहीं,
जो हुआ‌ न मेरा उसे कहा पाना है।।

कभी लगा नहीं जो लगा‌ अभी,
क्या ज़िंदगी छूट रही मेरी,
पल दो पल में जताकर मुझे,
हर ख्वाहिश मुझसे रूठ गई।।

दिल के घाव अजीब होते हैं,
वक्त के संग‌ ये भरते नहीं,
तसल्ली देना एहसान है खुद पे,
अरमानो का मेरे कोई मोल नहीं।।

दम तोड़ रहें सपने मेरे,
ख्वाहिशों की उम्र नहीं होती,
हर आरज़ू पूरी हो आपकी,
ऐसा भी तो ज़रूरी नहीं।।

समझदारी हकीकत की अलग होती है,
खुशी की क्या व्याख्या होती है,
कहते हैं सब कि खुश रहा करो,
हर दिल की खुशी कहां पूरी होती है।।

Jahnabee is an Independent working lady, Pet lovers, travel freak, music mind, culinary explorer, an extrovert and at the very core…a poet.

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6 Comments

6 Comments

  1. Surender Singh

    March 5, 2020 at 10:22 PM

    Once again very beautifully feelings have taken the shape of the words.
    Great.

    • Jahnabee

      March 6, 2020 at 6:47 AM

      Thankew so much @Surender☺️☺️

  2. Anonymous

    March 6, 2020 at 12:12 AM

    Nice

  3. Nikhil

    March 6, 2020 at 7:16 AM

    Eeeeennnnddddd
    Truth of life

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